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कितना जरूरी है ‘एक देश, एक चुनाव’, इसके पीछे की कुछ बातों को समझना भी जरूरी

१४ फ़रवरी, २०१८ ६:२५ पूर्वाह्न
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कितना जरूरी है ‘एक देश, एक चुनाव’, इसके पीछे की कुछ बातों को समझना भी जरूरी

आज चुनावों के विकास में बाधक होने का तर्क स्वीकार कर लिया गया तो क्या कल समूचे लोकतंत्र को ही विकासविरोधी ठहराने वाले आगे नहीं आ जाएंगे? किसे नहीं मालूम कि विकास हमेशा ही शासक दलों का हथियार रहा है और सरकारों को असुविधा तभी होती है जब उसके लाभों के न्यायोचित वितरण की बात कही जाए। चूंकि सरकार अपने जाप के आगे किसी की और कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है, स्वाभाविक ही उसके इस संबंधी इरादों को लेकर संदेह घने हो रहे हैं। संवैधानिक ढांचे में सरकारें पांच साल के लिए चुनी जाती हैं। हां, उनसे जनता का भरोसा उठता है और वे गिरती हैं तो मध्यावधि चुनाव होते हैं, जिनमें जनता को फिर से अपने विकल्प बताने का मौका मिलता है। ‘एक देश, एक चुनाव’ के नाम पर उसके इस विकल्प को खत्म करने की वकालत कैसे की जा सकती है?

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स्रोत: jagran.com

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