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गायब हो रही हैं रांची शहर से छोटी-छोटी नदियां, नहीं सुधरें तो इतिहास बन जायेंगे हम

१८ मई, २०१८ ४:५७ पूर्वाह्न
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गायब हो रही हैं रांची शहर से छोटी-छोटी नदियां, नहीं सुधरें तो इतिहास बन जायेंगे हम

Ranchi: उपग्रह की तस्वीरें रांची के करमटोली तालाब के पास से निकली एक छोटी सी नदी की कहानी कहती है. अगर लोगों की माने तो शायद ये करम नदी है. ये नदी तालाब के पास खेतों से निकल के बहती हुई डिस्टलरी तालाब को पार करके निकल जाती थी. 2004 में इसका बहाव स्पस्ट दिखाई दे रहा है. लेकिन 2017 में इसके बहाव में कई जगह अतिक्रमण हो गया है. रहा सहा कसर डिस्टलरी तालाब के सुंदरीकरण ने पूरा कर दिया. अगर नदी के दोनों तरफ 100 फीट छोड़ के मकानों का निर्माण हुआ होता तो शायद ये नदी खतरे में नहीं पड़ती. अगर डिस्टलरी तालाब का वैज्ञानिक तरीके से सुंदरीकरण होता, तो नदी अपने पुराने स्वरुप में ही बहती रहती. प्रकृति ने रांची शहर को कई छोटी छोटी नदियां दी थीं. जिसमें अधिकतर गायब हो गईं या अतिक्रमण की शिकार है. यही नदियां शहर के भूमिगत जल को बनाये रखती थी और शहर के तापमान को भी नियंत्रित करती थी. शहर का विकास भी जरुरी है. लेकिन अगर तरीके से होता तो आज ये स्थिति नहीं होती की लोग गर्मी से परेशान और पानी के लिए तरस रहे हैं.

झारखंड संस्कृति में नदियां सदा ही जीवनदायनी की तरह पूज्यनीय रही है. इन जीवनदायनी नदियों का महत्व सभी को समझना बेहद जरूरी है. कोई भी देश, राज्य, गांव, शहर बिना जल के महत्व के किसी भी प्रकार का सफर तय नहीं कर सकता. यह सभी नदियां हमारे शरीर की धमनियों की भांति कार्य करती हैं और इनका इस तरह से शिथिल हो जाना या गायब हो जाना निश्चय ही एक खतरनाक संकेत है. करोड़ों मनुष्यों को पोषण देने वाली जैव विविधता के साथ भौगोलिक क्षेत्र बदलते ही एक नये वातावरण का निर्माण करने वाली नदियों को सिर्फ मनुष्य का ही नहीं सभी जीव-जन्तु, पौधों का अधिकार है. इन लाखों करोड़ों लोगों को पालने वाली नदियों में कूड़ा-कचरा, सीवर, औद्योगिक कचरा ना जाने क्या-क्या डाला जा रहा है. आज के समय में इन नदियों की इस दशा और उसमें हमारी भागीदारी कहीं ना कहीं थोड़ी या ज्यादा, मगर है जरूर. नदियों के संरक्षण के अभियान में अब तक समाज की भागीदारी कभी सुनिश्चित नहीं की गई. जबकि समाज को उसकी जिम्मेदारी का आभास कराए बगैर नदियों का संरक्षण और शुद्धिकरण संभव ही नहीं है. इन मुद्दों के लेके किसी भी राजनीतिक पार्टी ने शहर में आज तक कोई भी आंदोलन नहीं किया.

एक वैश्विक अध्ययन से पता चला है कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में आ रहे लगातार अवरोधों के कारण नदियों और उसके सहारे चल रहा जीवन और जैव विविधता सभी कुछ संकट में पड़ गए हैं. आवश्यकता इस बात की है कि हम पुनः नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को सुनिश्चित करें.

नदियों का अस्तित्व बनाये रखना कोई मजाक नहीं है. ये ना हो कि नदियों के साथ मजाक करते-करते मानव सभ्यता कब मजाक बन जाये हमें पता ही नहीं चले. ये नदी नाले, तालाब, सब एक दूसरे को पोषण देते हैं और एक दूसरे के पूरक हैं. मानव ने सदा ही स्वयं को सभ्य कहा है पर प्रमाण देने में शायद सफल नहीं हो पाया. क्योंकि प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या और जो हो रहा है वही सम्यता की परिभाषा है तो पता नहीं ?

लेखक डॉ नितिश प्रियदर्शी प्रर्यावरणविद हैं. यह आलेख और तस्वीरें उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

स्रोत: newswing.com

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