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दिल्ली विश्वविद्यालय चुनाव में क्यों हारी ABVP?

१४ सितंबर, २०१७ १:५३ पूर्वाह्न
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दिल्ली विश्वविद्यालय चुनाव में क्यों हारी ABVP?

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चुनाव हुए और वहां एक बार फिर यूनाइटेड लेफ़्ट का लाल परचम लहरा गया.

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने इस हार में भी अपनी जीत देखी. उम्मीद थी कि जेएनयू में मिली हार और जीत तक ना पहुंचने के ज़ख़्मों पर डीयू की चुनावी जीत मरहम लगाएगी.

लेकिन ऐसा हो ना सका. साल 2016 में चार में से तीन सीट पर कब्ज़ा जमाने वाली एबीवीपी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावों में दो सीटें ही जीतने में कामयाब रही.

इस चुनाव में सबसे बड़ी ट्रॉफ़ी माना जाने वाला अध्यक्ष पद उसके हाथ से निकल गया.

जेएनयू में उसकी जीत के बीच वाम छात्र संगठन आ गए थे तो यहां हैरतअंगेज़ तरीके से कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई उसके आड़े आ गई.

और एनएसयूआई ने अपनी जीत और परिषद की हार का पोस्टमार्टम करने में ज़रा देर नहीं लगाई.

ज़ाहिर है आजकल हर छोटी-बड़ी जीत को केंद्रीय राजनीति से जोड़ने का चलन है. लेकिन जब हार मिले तो उसे संभालना कुछ मुश्किल हो जाता है.

एबीवीपी भी इस हार को डीयू कैम्पस की चारदीवारी तक देखना चाहती है. एबीवीपी के नेशनल मीडिया कंवेनर साकेत बहुगुणा ने कहा कि पिछले साल वो तीन सीट पर जीते थे, इस बार दो सीट पर, ऐसे में इसे हार कैसे कहा जा सकता है.

लेकिन एनएसयूआई की इस जीत को कांग्रेस अपनी वापसी के तौर पर पेश कर रही है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय माकन डूसू चुनावों के नतीजों से उत्साहित हैं और उन्होंने कहा कि ये भाजपा और उसकी नीतियों का ख़ारिज होना है.

लेकिन असल में ये जीत एनएसयूआई (या कांग्रेस) और हार एबीवीपी (या भाजपा) के लिए क्या मायने रखती है?

दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक अपूर्वानंद ने कहा कि इन दिनों छात्र संघ चुनाव किसी छोटी विधानसभा चुनाव की तरह लड़ा जाता है जिसमें राजनीतिक दल अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा देते हैं.

अपूर्वानंद ने कहा कि इन चुनावों में मिली जीत को प्रधानमंत्री की स्वीकृति के रूप में देखा जाता तो हार को भी एक तरह से अस्वीकृति माना जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में ही देखना चाहिए क्योंकि भाजपा के कई नेताओं के तस्वीर वाले पोस्टर भी लगाए गए थे. ऐसे में इस हार की कुछ ज़िम्मेदारी उन्हें भी लेनी चाहिए.

क्या इन नतीजों को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ा जाए या नहीं, क्या ये केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री पर जनमत है या नहीं, इन गंभीर सवालों से अलहदा ज़मीनी स्तर पर ऐसे क्या कारण थे कि एबीवीपी को मुंह की खानी पड़ी.

कुछ वक़्त पहले मीडिया में ख़बरें आई थीं कि डूसू को मिलने वाले आवंटन का बड़ा हिस्सा चाय-कॉफ़ी पर खर्च कर दिया गया. इस ख़बर ने भी परिषद को नुकसान पहुंचाया.

एबीवीपी के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया कैम्पेन चलाने वाली गुरमेहर कौर भी नतीजों से काफ़ी खुश हैं.

स्रोत: prabhatkhabar.com

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