NewsHub के साथ गर्मागर्म विषयों पर ताज़ातरीन ख़बरों के अपडेट प्राप्त करें। अभी इन्स्टाल करें।

प्रदीप द्विवेदी: क्या सामान्य वर्ग के लिए पीएम मोदी, वीपी सिंह साबित हो रहे हैं?

१२ अगस्त, २०१८ ८:१३ अपराह्न
3 0
प्रदीप द्विवेदी: क्या सामान्य वर्ग के लिए पीएम मोदी, वीपी सिंह साबित हो रहे हैं?

इनदिनों. सामान्य वर्ग शुरू से ही न केवल भाजपा का प्रमुख मतदाता रहा है, बल्कि वर्ष 2014 में सियासी तस्वीर बदलने का सबसे बड़ा प्रेरक वर्ग भी रहा है, लेकिन... इन चार साल के कड़वे अनुभवों के बाद सामान्य वर्ग का धैर्य जवाब देने लगा है, और इसीलिए बड़ा प्रश्र है कि- क्या सामान्य वर्ग के लिए पीएम मोदी, वीपी सिंह साबित होने जा रहे हैं?

नोटबंदी, जीएसटी, बैंकों के नए-नए कानून-कायदे आदि से सबसे ज्यादा प्रभावित और परेशान यह सामान्य वर्ग ही रहा है, लेकिन... सामान्य वर्ग को राहत तो दूर, आर्थिक आधार पर आरक्षण जैसे मुद्दों पर भी केन्द्र सरकार न्यायोचित निर्णय नहीं ले पाई? अब आम चुनाव- 2019 के मद्देनजर हो सकता है कि इस संबंध में कोई आश्वासन पकड़ा दिया जाए!

केन्द्र की पीएम मोदी सरकार के आम चुनाव में और वोटों की चाहत में किए गए निर्णयों के मद्देनजर ही प्रसिद्ध पत्रकार हरि शंकर व्यास- हिंदुओं में कलह करा जीतेंगे मोदी! में लिखते हैं कि... चाहे वक्त हिंदुओं का खराब माने या नरेंद्र मोदी व अमित शाह का, हिंदू समाज बिखराव और भटकाव के भंवर में है. मराठा आंदोलन एक बानगी है तो नरेंद्र मोदी सरकार का ताजा फैसला जातियों में घाव हरे करने वाला है. हिसाब से मोदी सरकार को अदालत में जा कर बताना था कि क्यों दलित कानून में गाली की शिकायत करने पर जेल भेजना जायज है, लेकिन अदालत के फैसले को अदालत में खारिज करवाने के बजाय वह खुद संसद में अब नया कानून बनवा दे रही है? ऐसा कानून जिससे हिंदुओं की गैर-दलित तमाम जातियों पिछड़ों, राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य याकि ओबीसी-फारवर्ड जातियां हमेशा खौफ में रहे. उन्हे जब चाहे, गाली बोलने की बात पर जेल में डलवा दिया जाए!

उनका मानना है कि... हिसाब से सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट में ही तर्क दे कर सुधरवाना या बदलवाना चाहिए था? तब जातियों के बीच न आंदोलन की नौबत आती और न राजनीति होती और न जातियों में नए विग्रह, कलह के बीज पड़ते? अब पड़ेगें और ऐसे पड़ेगे जिसमें भाजपा को न माया मिलेगी और न राम! सौ टका जान ले कि एससी-एसटी एक्ट बनवा कर भी दलित वोट भाजपा को रत्ती भर नहीं मिलने है. उलटे दलित संगठनों में यह जोश बनना है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह बड़े सूरमा बनते थे, नानी याद दिला दी. अब आने दो 2019, धूल चटा देगें? हां, यह होगा!

सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि श्रीराम मंदिर जैसे मुद्दे पर भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट के नाम पर खामोशी ओढ़ रखी है, किन्तु दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट के ही निर्णय को संसद में बदला जा रहा है?

यह भी पढ़ें: नाले में पाइप लगाकर गैस निकालिए और पकौड़े बनाइए, राहुल गाँधी

उल्लेखनीय है कि... आजादी के बाद पिछड़ों के उत्थान और समाज सुधार के कार्यों में सबसे बड़ा योगदान सामान्य वर्ग के नेताओं का ही रहा और आज भी है, लेकिन वोटों की राजनीति के चलते विभिन्न वर्गों में जहर भरने का काम हो रहा है? स्वच्छता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले पीएम मोदी, क्या एक दिन के लिए भी चिमनलाल मालोत की जिंदगी जी सकते हैं? दलितों के लिए बड़ी-बड़ी बातें करने वाली मायावती, रामविलास पासवान आदि क्या पिछड़ों के उत्थान के लिए किए गए मामा बालेश्वर दयाल के जीवनभर के समर्पण का आंशिक प्रदर्शन भी कर सकते हैं?

सामान्य वर्ग से ही नहीं, पिछड़ा वर्ग के नेता- राजस्थान के पूर्व एमएलए नाथूराम बोरी, पूर्व मंत्री भीखाभाई आदि ने भी पिछड़े वर्ग के साथ-साथ सामान्य वर्ग के कमजोर लोगों के उत्थान के लिए भी अनेक कार्य किए. यही वजह है कि दक्षिण राजस्थान विभिन्न वर्गों के बीच सद्भाव की मिसाल है!

इस वक्त दलितों के उत्थान के लिए सबसे जरूरी है- आरक्षित जातियों में आरक्षण यथावत रखते हुए आयकर आधार जोडऩे का, क्योंकि आजादी के बाद आरक्षण का लाभ लेने वाले सक्षम होने के बाद भी बार-बार लाभ लेते रहे हैं, नतीजा... आरक्षित जातियों में भी दो वर्ग बन गए हैं- सक्षम और कमजोर? अब आरक्षण के असली हकदार कमजोर लोगों के लिए तो अपने ही समाज के सक्षम लोग आगे बढऩे में सबसे बड़ी बाधा बनते जा रहे हैं? लिहाजा, यह जरूरी है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था को तो बरकरार रखा जाए, लेकिन इसमें आर्थिक आधार जोड़ दिया जाए ताकि उसी समाज के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण का लाभ मिल सके, उन्हें भी आगे बढऩे का अवसर मिले!

बहरहाल, केन्द्रीय भाजपा यह मान कर चल रही हे कि उसके साथ खड़ा सामान्य वर्ग तो कहीं नहीं जाएगा, ऐसे निर्णयों से दूसरे वर्गों के वोट भी उसकी झोली में आ जाएंगे? मतलब... 2019 में भाजपा को 2014 से भी बड़ी कामयाबी मिलेगी?

सच्चाई तो यह है कि संघ की बढ़ती ताकत के नतीजे में भाजपा को 2014 में बड़ी कामयाबी मिली थी, परन्तु पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी इस ताकत को संभाल नहीं पाई... इस कामयाबी को बरकरार नहीं रख पाई, वजह? केन्द्रीय भाजपा में एकाधिकार के लिए जहां कई वरिष्ठ नेताओं को किनारे किया गया, वहीं कांग्रेस मुक्त भारत के काल्पनिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सियासी जोड़-तोड़ चलती रही! किन्तु सवाल यह है कि सत्ता में बैठ कर नेताओं पर आधारित सियासी जोड़-तोड़ तो संभव है, लेकिन जनता का रूख किस तरह से बदलेगा?

अब भाजपा के विरोधी ही नहीं समर्थक दल भी कह रहे हैं कि भाजपा 2014 वाली सफलता नहीं दोहरा पाएगी? ऐसे में तो यही लगता है कि... आने वाले चुनाव में भाजपा को न माया मिलेगी, न राम!

यह भी पढ़ें: राहुल ने फिर साधा पीएम मोदी पर निशाना, कहा- राफेल पर कहीं भी बहस को तैयार

स्रोत: palpalindia.com

सामाजिक नेटवर्क में शेयर:

टिप्पणियां - 0