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प्रदीप द्विवेदी: भागवत की भाषा और भावना सही, भावार्थ गलत निकाला गया!

१४ फ़रवरी, २०१८ ६:२५ अपराह्न
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प्रदीप द्विवेदी: भागवत की भाषा और भावना सही, भावार्थ गलत निकाला गया!

विचारार्थ. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के सेना के संदर्भ में दिए गए बयान की भाषा और भावना, दोनों सही थी, लेकिन इसके भावार्थ गलत निकाले गए और बेवजह का विवाद खड़ा हो गया! खबरें हैं कि... इस बेवहज के विवाद के बाद संघ ने इस बयान पर सफाई भी पेश कर दी थी. संघ के प्रवक्ता मनमोहन वैद्य का कहना था कि संघ प्रमुख के बयान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया, उन्होंने कहा कि... भागवत जी ने कहा था कि परिस्थिति आने पर तथा संविधान द्वारा मान्य होने पर भारतीय सेना को सामान्य समाज को तैयार करने के लिए 6 महीने का समय लगेगा तो संघ स्वयंसेवकों को भारतीय सेना 3 दिन में तैयार कर सकेगी, कारण स्वयंसेवकों को अनुशासन का अभ्यास रहता है!

मनमोहन वैद्य का कहना था कि... यह सेना के साथ तुलना नहीं थी पर सामान्य समाज और स्वयंसेवकों के बीच में थी, दोनों को भारतीय सेना को ही तैयार करना होगा! इसी संदर्भ में सह सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने भी स्पष्ट किया कि... संघ प्रमुख ने कहा था कि यदि संविधान इजाजत दे और देश को अगर जरूरत होगी तो दो-तीन दिन में अनुशासित लोगों को तैयार कर सकते हैं जबकि सेना को एक जवान को तैयार करने में छह-सात महीने लगते हैं. दत्तात्रेय ने पटना में आरएसएस के पूर्व प्रमुख के जीवन पर लिखी पुस्तक का विमोचन करने के बाद कहा कि संघ प्रमुख ने सेना से कोई इसकी तुलना नहीं की थी. उनका कहना था कि सामान्य लोगों को अनुशासन सीखने में समय लगेगा, लेकिन स्वयंसेवक पहले से ही अनुशासन में रहते हैं तो उन्हें तैयार करने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है! उल्लेखनीय है कि... संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मुजफ्फरपुर में एक समारोह के दौरान स्वयंसेवकों से सेना की तुलना की खबरें सामने आई थी जिसके बाद इस पर विवाद शुरू हो गया, यही नहीं... आरएसएस के विरोधियों ने इसे मुद्दा बना कर बयानों की बरसात कर दी, जबकि वास्तविकता एकदम भिन्न थी, उन्होंने कहा था कि... देश को अगर हमारी जरूरत पड़े और हमारा संविधान और कानून इजाजत दे हम तुरंत तैयार हो जाएंगे! इसके बाद कई नेताओं ने उनकी भाषा और भावना को ठीक-से समझे बगैर ही इसे बेवजह सेना का अपमान करार दिया?

इस संदर्भ में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जरूर संघ प्रमुख का समर्थन किया और कहा कि... अगर कोई संगठन देश की रक्षा करना चाहता है तो इसमें विवाद नहीं होना चाहिए! समाजवादी पार्टीं के पूर्वं नेता अमर सिंह का कहना था कि... मोहन भागवत पूजनीय एवं परिपक्व व्यक्ति हैं... बयान के पीछे उनकी भावना समझी जानी चाहिए... देश की सीमाओं पर आतंकवाद बढ़ा है, जिससे व्यथित होकर प्रत्येक भारतीय आज ईंट का जवाब पत्थर से देने की सोच रहा है... ऐसे में आप मेरी बात का कुछ भी मतलब निकाल सकते हैं! आरएसएस और उसकी विचारधारा से कई राजनेताओं की असहमति हो सकती है, किन्तु स्वयंसेवकों की राष्ट्रीय-भावना और सेवा-समर्पण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. अनुशासन और समर्पण, दो ऐसे गुण हैं जिनका सेना में विशेष महत्व है... किसी आम व्यक्ति में इन दोनों गुणों को विकसित करने में लंबा वक्त लगता है, लेकिन आरएसएस के स्वयंसेवकों को लगातार जो अभ्यास करवाया जाता है उसके नतीजे में उनमें ये गुण विकसित होते हैं और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इसी के सापेक्ष बयान दिया था! यकीनन्, आरएसएस के किसी नेता के हर विचार से कोई सहमत हो यह जरूरी नहीं है, लेकिन... हर विचार का... हर बयान का... हर भावना का बगैर सोचे-समझे विरोध करना भी सही नहीं है!

स्रोत: palpalindia.com

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