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बच्‍चों के साथ बलात्‍कार: महज़ आंकड़ों का बढ़ना पूरी तस्वीर नहीं

१२ जुलाई, २०१८ ६:५७ पूर्वाह्न
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छोटी बच्चियों के साथ बर्बर यौन हिंसा की ख़बरें भारतीय मीडिया में जिस तेज़ी से आ रही हैं उससे ये महसूस होता है कि ऐसे मामलों की तादाद बढ़ी है.

मध्य प्रदेश के उन्नाव में पिछले महीने सात साल की बच्ची के साथ बलात्कार और उससे पहले कश्मीर में एक आठ साल की बच्ची का सामूहिक बलात्कार और हत्या.

इन्हीं मामलों के मद्देनज़र भारत सरकार एक अध्यादेश के ज़रिए बारह साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान ले आई.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो से प्राप्‍त आंकड़ों के मुताबिक पिछले पांच साल में बच्चियों से बलात्कार के मामले साल 2012 में 8,541 से बढ़कर 2016 में 19,765, यानी क़रीब दोगुने हो गए हैं.

लेकिन महज़ आंकड़ों का बढ़ना पूरी तस्वीर नहीं है. इस बढ़त की कुछ वजहें हैं.

साल 2012 में भारत सरकार ने बच्चों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा से निपटने के लिए पहली बार एक समग्र क़ानून बनाया, ‘द प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन अगेन्स्ट सेक्शुअल ऑफेन्सिस एक्ट’ (पॉक्सो).

इस क़ानून के तहत बलात्कार को सिर्फ़ ‘पेनिट्रेशन’ तक सीमित रखने की जगह इसमें अन्य तरह की यौन हिंसा, जैसे ‘ओरल सेक्स’, बच्चों के निजी अंगों के साथ छेड़छाड़ करना या बच्चे से वयस्क द्वारा अपने गुप्तांगों की छेड़छाड़ करवाना इत्यादि शामिल किया गया.

इस तरह की यौन हिंसा बच्चों के मामले में ज़्यादा देखी जाती है और इससे बच्चों के बलात्कार की परिभाषा और बड़ी हो गई.

‘हक़ सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स’ से जुड़े कुमार शैलभ के मुताबिक, “बेहतर क़ानून ने बलात्कार की परिभाषा बड़ी करके मामलों को पुलिस तक पहुंचने का रास्ता तो खोला है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हिंसा की दर बढ़ी है.”

पॉक्सो क़ानून आने से पहले पुलिस और डॉक्टरों पर बच्चों के बलात्कार की जानकारी मिलने के साथ उस पर कार्यवाही करने की कोई बाध्यता नहीं थी.

पॉक्सो ने ये बदल दिया. अब अगर बच्चे के ख़िलाफ़ यौन हिंसा की जानकारी मिले और कार्यवाही ना की जाए तो सज़ा और जुर्माना हो सकता है.

मुंबई में ‘मजलिस लीगल सेंटर’ में बलात्कार पीड़ितों के साथ काम कर रहीं ऑड्रे डीमेलो कहती हैं, “अब डॉक्टर और पुलिस बस ये कहकर बच्चों या उनके परिवारों को वापस नहीं भेज सकते कि ये तो घर का मामला है, इससे मामले तो बढ़ने ही थे.”

क़ानून के इन प्रावधानों के असर तुरंत देखने को मिला और साल 2012 में 8,541 मामले बढ़कर अगले ही साल 2013 में 12,363 हो गए.

सेक्स के लिए सहमति देने लायक उम्र को क़ानूनी तौर पर ‘एज ऑफ़ कनसेंट’ कहा जाता है.

भारत में ये 16 साल हुआ करती थी पर पॉक्सो एक्ट के तहत इसे बढ़ाकर 18 साल कर दिया गया.

इससे 16 से 18 साल की उम्र में सहमति से यौन संबंध बनाने वाले कई किशोरों को भी बलात्कार के मामलों में आरोपी बनाए जाने का ख़तरा बन गया.

साल 2015 में महिलाओं के स्तर पर एक उच्च स्तरीय समिति ने रिपोर्ट पेश की और सुझाव दिया कि ‘एज ऑफ़ कनसेंट’ के क़ानून में एक प्रावधान लाया जाए जिसके तहत 16 से 18 साल की उम्र के दो किशोंरों को सहमति से यौन संबंध बनाने की क़ानूनी अनुमति हो.

नवंबर 2012 में पॉक्सो एक्ट के पारित होने के ठीक एक महीने बाद दिल्ली में ज्योति सिंह (जिन्हें मीडिया ने निर्भया नाम दिया) का बलात्कार हुआ.

मीडिया में लगातार ख़बरें और जनता में आक्रोश के बाद वयस्क महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के लिए बने क़ानूनों में संशोधन हुए और पॉक्सो की तर्ज़ पर बलात्कार की परिभाषा बड़ी की गई और जांच ना करने पर कार्यवाही का प्रावधान लाया गया.

नतीजा ये कि बच्चों के बलात्कार के मामलों की ही तरह 2012 से बढ़कर 2013 में वयस्क महिलाओं के बलात्कार के मामलों में 35 फ़ीसदी उछाल आया.

मामलों में बढ़त ना भी हुई हो पर ये भी सच है कि भारत में बच्चों के बलात्कार के जितने मामले पुलिस में दर्ज होते आए हैं वो असल हिंसा का एक छोटा हिस्सा भर हैं.

साल 2007 में महिला और बाल विकास मंत्रालय ने ‘द नेशनल स्टडी ऑन चाइल्ड अब्यूज़’ में देश के 13 राज्यों में 17,000 बच्चों से बात कर कुछ चौंकाने वाले निष्कर्ष निकाले.

शोध के मुताबिक 53.2 फ़ीसदी बच्चों ने एक या एक से ज़्यादा तरीके की यौन हिंसा का शिकार होने की बात मानी.

बेहतर क़ानून और ज़्यादा मामले पुलिस तक पहुंचने के बावजूद पूरे हुए मुकदमों में सज़ा दिए जाने की दर यानी ‘कनविक्शन रेट’ बदला नहीं है. बल्कि 2012 के स्तर 28.2 फ़ीसदी पर ही बना हुआ है.

पॉक्सो एक्ट के तहत हर मुकदमा एक साल में पूरा हो जाना चाहिए पर ऐसा कभी-कभार ही होता है.

बच्चों के बलात्कार के मामलों में हिंसा अक़्सर परिवार या किसी जानने वाले के हाथों होती है और लंबे मुकदमे के दौरान शिकायत वापस लेने के दबाव बढ़ जाता है.

कुमार शैलभ कहते हैं, “गवाह और शिकायतकर्ता की सुरक्षा के इंतज़ाम के अभाव में, संवेदनशील पब्लिक प्रॉसिक्यूटर्स, बच्चों की अदालतें और फ़ोरेंसिक लैब्स की कमी के चलते अदालत में केस कमज़ोर पड़ जाते हैं और ज़्यादा मामले पुलिस तक पहुंचने का फ़ायदा ज़ाया चला जाता है.”

स्रोत: legendnews.in

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