NewsHub के साथ गर्मागर्म विषयों पर ताज़ातरीन ख़बरों के अपडेट प्राप्त करें। अभी इन्स्टाल करें।

Internet पर अपनी बीमारी के लिए लक्षण और दवाओं की खोज करने से बचें

२७ दिसंबर, २०१८ १०:०३ पूर्वाह्न
70 0

लोगों में दवाइयों का इस्तेमाल जानने को लेकर भी काफी उत्सुकता होती है। वह इस्तेमाल से लेकर दुष्प्रभाव तक इंटरनेट पर खोजने लगते हैं। डॉ। राजीव कहते हैं कि भले ही व्यक्ति किसी भी पेशे से क्यों न हो लेकिन वो खुद को दवाइयों में विशेषज्ञ मानने लगता है। उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया, ”एक बार मेरे एक मरीज के रिश्तेदार ने फोन करके मुझसे गुस्से में पूछा कि आपने ये दवाई क्यों लिखी। वो रिश्तेदार वर्ल्ड बैंक में काम करते थे। उन्होंने कहा कि इंटरनेट पर तो लिखा है कि ये एंटी डिप्रेशन दवाई है और मरीज को डिप्रेशन ही नहीं है। तब मैंने समझाया कि ये दवाई सिर्फ एंटी डिप्रेशन की नहीं है। इसके और भी काम है लेकिन इंटरनेट पर पढ़कर ये नहीं समझा जा सकता।”

अगर आप इंटरनेट पर ‘सिम्टम्पस ऑफ ब्रेन ट्यूमर’ सर्च करें तो वो सिरदर्द, उलटी, बेहोशी और नींद की समस्या जैसे लक्षण बताता है। इनमें से कुछ लक्षण दूसरी बीमारियों से भी मिलते-जुलते हैं। इसी तरह सिरदर्द सर्च करने पर ढेरों आर्टिकल इस पर मिल जाते हैं कि सिरदर्द से जुड़ी कौन-कौन सी बीमारियां होती हैं। इससे मरीज भ्रम में पड़ जाता है। मनोचिकित्सक डॉ। संदीप वोहरा बताते हैं, ”ऐसे लोगों को जैसे ही खुद में कोई लक्षण नजर आता है तो वो इंटरनेट पर उसे दूसरी बीमारियों से मैच करने लगते हैं। इंटरनेट पर छोटी से लेकर बड़ी बीमारी दी गई होती है। मरीज बड़ी बीमारी के बारे में पढ़कर डर जाते हैं।”

डॉ। राजीव डैंग कहते हैं, ”वीडियो देखकर सर्जरी करना बहुत ही आपत्तिजनक है। मैं कई बार सर्जरी में शामिल रहा हूं लेकिन मेरी उसमें विशेषज्ञता नहीं इसलिए मैं भी कभी खुद सर्जरी करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। आप पहली बार तो चाय भी ठीक से नहीं बना सकते तो सर्जरी कैसे करेंगे। ऐसा करने वाले का दिमाग सामान्य नहीं हो सकता।”

अपनी बीमारी के बारे में सबकुछ जानना मरीज का हक है लेकिन परेशानी ये होती है कि नेट पर दी गई हर जानकारी सही नहीं होती। कई तरह की सनसनीखेज बातें नेट पर डाली जाती हैं। जैसे कि चार महीने के शिशु को बचाया गया लेकिन प्रैक्टिस में ऐसा नहीं होता। फिर लोग हमसे भी ऐसा ही उम्मीद करने लगते हैं और बहस करते हैं। इसके कारण डॉक्टर और मरीज के रिश्ते में कई सारे दिक्कतें आ रही हैं। ”दरअसल, दवाइयों के डॉक्यूमेंट्स में सारे रिएक्शन लिखे जाते हैं लेकिन ये सभी रिएक्शन हर व्यक्ति पर लागू नहीं होते। कोई रिएक्शन दस हजार में से किसी एक को भी हो सकता है। पर लोग डर की वजह से दवाइयां लेना ही बंद कर देते हैं।”

”यहां तक कि डॉक्टर ऐसे मरीजों को नेट पेशेंट या गूगल डॉक्टर कहने लगे हैं। आप भरोसे के साथ आईए। जब आप डॉक्टर पर भरोसा दिखाएंगे तभी इलाज हो पाएगा। भले ही आप दूसरे डॉक्टर की सलाह ले लीजिए लेकिन इंटरनेट के आधार पर फैसला मत कीजिए।”

वहीं आईएमए ने इंटरनेट पर मौजूद सामग्री और ऑनलाइन कंसल्टेंसी को लेकर एक रिपोर्ट तैयार करके सरकार को दी है। हमारे देश में टेली मेडिसन, टेली कंसल्टेंशन, इंटरनेट कंसल्टेंशन कोई नीति नहीं बनी है। इस नीति में सहयोग के लिए एक दस्तावेज दिया है। Internet पर हर चीज़ पर प्रतिबंध तो नहीं लगाया जा सकता लेकिन उनमें चेतावनी डाली जा सकती है कि उसका घर पर अपनी मर्जी से इस्तेमाल न करें।”

स्रोत: legendnews.in

सामाजिक नेटवर्क में शेयर:

टिप्पणियां - 0