इस आपदा के हिमालयी सबक

१३ मई, २०१५ २:५२ पूर्वाह्न

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हम इन सभी कदमों की प्रशंसा करें। पर क्या हम इस कदम की प्रशंसा करें कि केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने पर्यावरण मंत्रालय द्वारा हिमालयी उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं को दी ताजा मंजूरी को लेकर सवाल उठाया और किसी ने इसकी परवाह नहीं की। उमा भारती ने कहा कि इन परियोजनाओं के कारण गंगा का पारिस्थितिकीय प्रवाह सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाएगा। असलियत यह है कि परियोजनाओं के लिए बांध, सुरंग, विस्फोट, निर्माण और मलबे के कारण गंगा, हिमालय और हिमवासी… तीनों ही तबाह होने वाले हैं। ‘मैं आया नहीं हूं; मुझे मां ने ही बुलाया है’- क्या यह कहने वाले प्रधानमंत्री को नहीं चाहिए था कि वे हस्तक्षेप करते और कहते कि मुझे मेरी मां गंगा और पिता हिमालय की कीमत पर बिजली नहीं चाहिए? हिमालयी जलस्रोत वाली नदियों में बांध और सुरंगों का हिमवासी और पर्यावरणविद लगातार विरोध कर रहे हैं?

क्या कोई सरकार आज तक बांध नीति बना पाई? प्रधानमंत्री ने 2014 की अपनी पहली नेपाल यात्रा में ही उसे पंचेश्वर बांध परियोजना का तोहफा दिया। वहां से लौटे विमल भाई बताते हैं कि 280 मीटर ऊंचाई की यह प्रस्तावित परियोजना, खुद भूकम्प जोन 4-5 में स्थित है। मध्य हिमालय का एक बड़ा हिस्सा इसके दुष्प्रभाव में आने वाला है। आगे जो होगा, उसका दोष किसका होगा; सोचिए? नदी नीति, हिमालयी क्षेत्र के विकास की अलग नीति और मंत्रालय की मांग को लेकर लंबे समय से कार्यकर्ता संघर्षरत हैं। सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है? क्या हम इसकी प्रशंसा करें?

राहुल गांधी की केदारनाथ यात्रा पर प्रदेश कांग्रेस के महासचिव ने कहा कि इसका मकसद यह बताना भी था कि कभी त्रासदी का शिकार हुआ केदारनाथ इलाका अब ठीक कर लिया गया है। देश भर से पर्यटक अब यहां आ सकते हैं। मात्र दो वर्ष पूर्व उत्तराखंड में हुई तबाही को आखिर कोई कैसे भूल सकता है? प्रथम इंसान की रचना हिमालय में हुई। हिमालय को देवभूमि कहा जाता है। इस नाते हिमालय पर्यटन नहीं, तीर्थ का क्षेत्र है। अब विनाश की आवृत्ति के तेज होने के संदेश भी यहीं से मिल रहे हैं। पर्यटन और पिकनिक के लिए हिमालय में पर्यटकों की बाढ़ आई, तो तबाही पर नियंत्रण फिर मुश्किल होगा। क्या किसी ने टोका कि कृपया गलत संदेश न दें?

एक कंपनी ने तो भगवान केदारनाथ की तीर्थस्थली पर बनाए अपने होटल का नाम ही ‘हनीमून’ रख दिया है। सत्यानाश! हम ‘हिल व्यू’ से संतुष्ट नहीं हैं। हम पर्यटकों और आवासीय ग्राहकों को सपने भी ‘रिवर व्यू’ के ही बेचना चाहते हैं। यह गलत है, तो नतीजा भी गलत ही होगा। प्रकृति को दोष क्यों? हमने धड़धड़ाती वोल्वो बस और जेसीबी जैसी मशीनों के लिए पहाड़ के रास्ते खोल दिए। पगडंडियों को राजमार्ग बनाने की गलत की। यह न करें। अब पहाड़ों में और ऊपर रेल ले जाने का सपना देख रहे हैं। क्या होगा?

स्रोत: jansatta.com

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