उच्च शिक्षा का अंतिम संकट

७ मई, २०१५ ३:०८ पूर्वाह्न

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उदारतावादी विश्वदृष्टि व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए भी अनिवार्य है, क्योंकि वह उसकी मौलिकता का आधार है, जिसके जरिए वह तेजी से आ रहे बदलावों का मुकाबला आत्मविश्वास के साथ कर सकता है। उच्चशिक्षा को रोजगार-योग्य प्रशिक्षण का पर्याय मान लेने से जो दूसरी बात हम भूल जाते हैं, वह है रोजगार और जिंदगी का फर्क, जो कमोबेश बाजार और समाज के बीच के फासले का ही स्वरूप है। इसमें कोई शक नहीं कि बाजार और अर्थव्यवस्था में शरीक होकर रोजी-रोटी कमाना लगभग हर इंसान की नियति है और इसे निभाने में हम अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा झोंक देते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बाजार के हित और समाज के हित एक या हमेशा एक-दूसरे के अनुकूल होते हैं। हमारे युग में बाजार का वर्चस्व अपनी चरम सीमा पर है। ऐसे समय में अगर समाज के हित बाजार के हित से टकराते हैं, तो समाज के हितों की रक्षा के लिए वैचारिक और व्यावहारिक संसाधन कहां से मिलेंगे?

आधुनिक युग में उच्चशिक्षा की प्रतिष्ठा उसके ठीक इसी प्रकार के संसाधनों के कारगर स्रोत होने पर टिकी है। लेकिन आज हम इस अमूल्य सामूहिक संपदा को बाजार के हवाले करने पर तुले हुए हैं, क्योंकि शिक्षा का व्यवसायीकरण उसका बाजारीकरण ही तो है!

स्रोत: jansatta.com

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