एंडोमीट्रियोसिस से जूझ रही हैं महिलायें, जानिए क्‍या है ये बीमारी

१५ नवंबर, २०१७ ७:१३ पूर्वाह्न

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इस बीमारी में गर्भाशय के आस-पास की कोशिकाएं और ऊतक (टिशू) शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल जाते हैं जो सामान्य नहीं है.

जिन महिलाओं को मेनोपॉज़ हो चुका होता है यानी जिनका मासिक धर्म बंद हो जाता है, उनमें एंडोमीट्रियोसिस होने की आशंका कम होती है.

यह लंबे वक़्त तक रहने वाली बीमारी है जो मरीज को शारीरिक और मानसिक तौर पर तोड़कर रख देती है. इससे जूझ रही महिलाओं के मां बनने की संभावना भी काफ़ी कम हो जाती है.

दरअसल एंडोमीट्रियोसिस के मरीज़ को जब पीरियड्स होते हैं तो खून गर्भाशय के बाहर गिरकर इकट्ठा होने लगता है. इस खून की वजह से सिस्ट या गांठें बढ़ने लगती हैं. साथ ही तकलीफ़ भी बढ़ने लगती है.

चूंकि गर्भावस्था के दौरान नौ महीने तक महिला को मासिक धर्म नहीं होता इसलिए खून न मिलने की वजह से गांठें बढ़नी बंद हो जाती हैं. इस स्थिति में ऑपरेशन करके इन्हें निकाला जा सकता है.

हालांकि ऐसा ज़रूरी नहीं है कि मां बनने के बाद एंडोमीट्रियोसिस की तकलीफ़ कम हो जाती है. कई बार परेशानी जस की तस बनी रहती है या बढ़ भी जाती है.

अपराजिता शर्मा भी एंडोमीट्रियोसिस की पीड़िता हैं जो सोसायटी के जागरूकता कार्यक्रम में भाग लेने आई हैं, उनके अब तक चार ऑपरेशन हो चुके हैं लेकिन फिर भी वो पूरी तरह ठीक नहीं हो पाई हैं.

अपराजिता को शादी के दो साल बाद पता चला कि उनका एंड्रोमीट्रियोसिस गंभीर स्टेज पर है. इससे पहले पीरियड्स के दौरान बहुत ज़्यादा दर्द होने पर अपराजिता 24 साल की उम्र में डॉक्टर से मिली थीं.

वो बताती हैं,”उस डॉक्टर का कहना था कि मुझे पहले स्टेज का एंड्रोमीट्रियोसिस है. उन्होंने मुझे जल्दी शादी करके मां बनने की सलाह दी थी.”

उन्होंने बताया,”भारत में इस बीमारी को लेकर जागरूकता और सुविधाओं की बेहद कमी है. हालात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में ऐसे गिने-चुने डॉक्टर ही हैं जो इन गांठों को पूरी तरह से शरीर से बाहर निकाल सकें.”

यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि एंडोमीट्रियोसिस की स्थिति में गाइनोकॉलजिस्ट आपकी मदद कर पाए, ये ज़रूरी नहीं. आपको एंड्रोक्राइनोलॉजिस्ट के पास जाना चाहिए.

अपराजिता की शिक़ायत है कि डॉक्टरों ने उन्हें हर तरीके की दवाइयां दीं, हर तरह का ऑपरेशन किया लेकिन जो स्थायी उपाय किया जाना चाहिए, वो किसी ने नहीं किया.

इस बीच अपराजिता ने इंटरनेट पर एंडोमीट्रियोसिस के बारे में पढ़ना और जानकारी जुटाना शुरू कर दिया था.

फ़िलहाल अपराजिता का हार्मोनल ट्रीटमेंट चल रहा है. उनका अनुभव है कि भारतीय डॉक्टर भी औरतों के मां बनने की चिंता पहले करते हैं, उनकी तकलीफ़ की बाद में.

उन्होंने बताया,”एंडोमीट्रियोसिस की कोई ख़ास वजह नहीं होती. कई बार ये आनुवांशिक वजहों पर भी निर्भर करता है. मरीज़ पर इलाज के असर का ठीक अनुमान लगा पाना भी मुश्किल है.”

कुछ महिलाओं को एक सर्जरी के बाद ही आराम हो जाता है और कुछ को तीन-चार ऑपरेशनों से होकर गुज़रना पड़ता है.”

37 साल की अपराजिता शर्मा चौथे स्टेज के ‘एंडोमीट्रियोसिस’ से जूझ रही हैं. यह एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में महिलाओं को बहुत कम जानकारी है और इस बारे में बात भी बहुत कम होती है.

अपराजिता का मानना है कि है कि भारतीय समाज में औरतों के स्वास्थ्य को गंभीरता से नहीं लिया जाता.

अपराजिता ज़ोर देकर कहती हैं कि पीरियड्स के दौरान दर्द और यूरिन इंफ़ेक्शन जैसी समस्याओं को संजीदगी से लिया जाना चाहिए. इसके साथ ही साफ़-सफ़ाई और डाइट पर भी ख़ास ध्यान दिया जाना चाहिए.

स्रोत: legendnews.in

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