केएमसी चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल में बीजेपी के डर से उबर रही है सीपीएम

२२ मई, २०१५ ८:४५ पूर्वाह्न

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केएमसी चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल में बीजेपी के डर से उबर रही है सीपीएम

कोलकाता. नेतृत्व में बदलाव और जारी व्यापक सुधारात्मक अभियान के साथ ही सीपीएम ने 6 साल में पहली बार पश्चिम बंगाल में उबरने के कुछ संकेत दिए हैं. यह वही पश्चिम बंगाल है जहां सीपीएम 2011 की करारी हार से पहले 35 साल तक शासन कर चुकी है. वाम मोर्चे की सबसे बड़ी घटक सीपीएम वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद से लगातार खिसक रहे अपने जनाधार को कुछ हद तक रोकने में कामयाब रही है.

पिछले महीने हुए कोलकाता नगर निगम (केएमसी) के चुनाव में वह अपनी वोट हिस्सेदारी न सिर्फ बचाने में बल्कि उसे थोड़ा सा बढ़ाने में भी सफल रही है. केएमसी के चुनाव सीपीएम के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहे क्योंकि वह आशंकित थी कि कहीं प्रमुख विपक्ष का दर्जा बीजेपी के हाथों में न चला जाए. बीजेपी लोकसभा चुनाव के बाद से बंगाल में तेजी से अपनी जमीन तैयार कर रही थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने सबसे खराब प्रदर्शन के बाद सीपीएम को लगभग 23 पर्सेंट वोट मिले लेकिन वह केएमसी के चुनाव में अपने वोट की हिस्सेदारी बचाने में सफल रही और इसमें वह एक पर्सेंट की वृद्धि के साथ 24 पर्सेंट से ज्यादा वोट हासिल कर गई.

हालांकि 2008 में वाम दल को उस समय पहली चुनावी गिरावट का सामना करना पड़ा था, जब वह नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के उद्गम स्थल पूर्वी मिदनापुर, और दक्षिण 24-परगना में जिला परिषद के चुनाव तृणमूल कांग्रेस के हाथों उसे हार मिली थी. 2009 के लोकसभा चुनावों में वाम मोर्चे को भारी गिरावट का सामना करना पड़ा था. तब कांग्रेस और तृणमूल ने मिलकर राज्य की 42 सीटों में से 27 सीटें जीत ली थीं.

इसके बाद होने वाले हर चुनाव में वाम मोर्चे की वोट में हिस्सेदारी में गिरावट आई है. 2009 में, वाम 43 पर्सेंट वोट हासिल करने में सफल रहा. जबकि 2011 के विधानसभा चुनावों में यह पर्सेंट गिरकर 40 रह गया और 2013 के पंचायत चुनावों में इस मत पर्सेंट में और अधिक गिरावट आई. अंतिम वर्ष 2014 में सीपीएम मत पर्सेंट के लिहाज से अपने निम्नतम बिंदु यानी 23 पर्सेंट पर आ गई. वह लोकसभा में महज दो ही सीटें हासिल कर सकी.

स्रोत: palpalindia.com

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