क्या फिर से मंदी आने वाली है?

७ सितंबर, २०१५ ४:०५ अपराह्न

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क्या फिर से मंदी आने वाली है?

पिछले 14 महीनों में पहली बार बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक 25 हज़ार अंकों से नीचे पहुँच गया.

सोमवार को सेंसेक्स ने 308 अंक गँवाए जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक निफ़्टी भी बाज़ार में गिरावट से नहीं बच सका.

अगस्त का महीना शेयर बाज़ारों के लिए बहुत बुरी ख़बर लाई. सितम्बर के पहले हफ़्ते ने भी शेयरों के भाव में भारी गिरावट देखी है.

मेरा अनुमान ये है कि इस लेख को पढ़ने वाले अधिकतर लोग शेयर बाज़ार में उतार-चढ़ाव की ख़बरों से प्रभावित नहीं होते होंगे क्योंकि देश की 125 करोड़ की आबादी के मात्र दो प्रतिशत लोग ही शायरों में अपना पैसा निवेश करते हैं.

मैं भी उन 98 प्रतिशत भारतीयों में शामिल हूँ जो शेयर बाज़ार में निवेश नहीं करते. लेकिन मेरी नज़र हमेशा बाज़ार के उतार-चढ़ाव पर बनी रहती है क्योंकि इससे देश की अर्थव्यवस्था की सेहत का पता चलता है.

लेकिन जब आपको पता चले कि अगस्त में भारतीय शेयरों के भाव में नौ प्रतिशत की गिरावट आई है यानी एक शेयर का भाव 10 रुपए से गिर कर केवल एक रुपए रह गया, कई कंपनियों की आर्थिक हालत बिगड़ गई है और कई लोगों की पूँजी सिकुड़ गई है तो आपकी उत्सुकता बढ़ेगी.

मुंबई के शेयर दलाल अब 24 अगस्त के सोमवार को 'ब्लैक मंडे' के नाम से याद रखते हैं.

अकेले उस दिन शेयर बाज़ारों में आए भूकंप से निवेशकों को सात लाख करोड़ रुपए का घाटा हुआ. उस दिन रुपये की क़ीमत भी लगभग 4 प्रतिशत गिरी.

आज के लेख की ज़रूरत इस लिए पड़ी क्योंकि आने वाले दिनों में शेयर बाज़ारों में ज़बरदस्त उतार-चढ़ाव जारी रहने की पूरी संभावना है.

दिल्ली में केंद्रीय वित्त मंत्रालय से लेकर मुंबई में ब्रोकरों के इलाक़े दलाल स्ट्रीट तक सब की निगाहें बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर टिकी रहेंगी.

कई साल में पहली बार चीन की अर्थव्यवस्था के विकास की रफ़्तार में भारी कमी का जब एहसास हुआ तो चीन में शेयरों के भाव तेज़ी से गिरने लगे.

चीन की अर्थव्यवस्था अमरीका के बाद दुनिया की दूसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था है.

चीन आयात और निर्यात, दोनों में दुनिया के पांच बड़े देशों में शामिल है. इस कारण अगर चीन की अर्थव्यवस्था में संकट पैदा हो तो उसका असर सभी देशों में होता है.

अगर अगस्त में शेयरों में भारी गिरावट का कारण दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी तो 2008 में भारतीय शेयर बाज़ारों में बड़े पैमाने पर आए संकट का कारण विश्व की नंबर वन अर्थव्यवस्था अमरीका था जो दुनिया भर में आर्थिक मंदी का भी कारण बना था.

उस समय का संकट ताज़ा संकट से कई गुना अधिक गंभीर था. कई आम भारतीय निवेशक और कंपनियां दिवालिया हो गए थे.

मुंबई में कई सालों तक आर्थिक मामलों पर रिपोर्टिंग करने के कारण हमारी जान पहचान शेयर दलालों से है.

इन दिनों वो उसी तरह से परेशान हैं जैसे 2008 में थे. इसका कारण वो ये बताते हैं कि चीन की दिन-बदिन ख़राब होती अर्थव्यवस्था की वजह से एक बार फिर दुनिया भर में मंदी आ सकती है.

और इसीलिए अगर आप शेयरों में निवेश न भी करते हों तो इसका असर आपकी आर्थिक सेहत पर पड़ सकता है.

शेयर दलालों और शेयरों के खुदरा निवेशकों को साल 2014 की याद आ रही होगी, जब मार्केट में 25 प्रतिशत उछाल के कारण उन्होंने काफ़ी पैसे कमाए थे.

ये उछाल दरअसल 2013 में ही उस समय शुरू हो गया था जब नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उमीदवार घोषित कर दिए गए थे.

साल 2015 को रियलिटी चेक का साल माना जा रहा है. शेयर बाज़ारों के लिए भी और मोदी सरकार के लिए भी.

अगर अगस्त में शेयरों के भाव कटी पतंग की तरह गिरे तो ये सितम्बर और अक्तूबर में बरसात की धूप-छाँव की तरह उतार-चढाव की आँख मिचोली खेलते रहेंगे.

शेयर बाज़ारों की अनिश्चितता के कारण ही एक आम भारतीय सोना और रियल एस्टेट में निवेश अधिक करता है.

शेयर बाज़ारों में खेलना जोखिम उठाने वालों का पेशा है. अगर आज आप किसी शेयर दलाल से सलाह लें तो वो कहेगा मंदी के दौर में शेयर ख़रीदना सब से अधिक लाभदायक है.

वो ये भी सलाह देगा कि आप मार्केट में निवेश करना चाहते हों तो लम्बे रेस के घोड़े की तरह आएं यानी निवेश करके कुछ सालों के लिए इस बारे में भूल जाएँ.

ज़माने से निवेश करते आ रहे लोगों के अनुसार ये शेयर बाज़ारों में निवेश करने का सही समय है.

लेकिन अगर आज आप 100 रुपये निवेश करते हैं तो अगले कुछ सप्ताह और महीनो में घटकर ये 50 रुपये भी हो सकता है या बढ़कर 150 रुपये भी.

ये इस बात को जानने के लिए भी सही समय है कि आप रिस्क लेने वालों में से हैं या नहीं. मैं तो बिलकुल नहीं हूँ.

स्रोत: bbc.com

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