केरल के मंदिरों में अब दलित पुजारी

८ अक्‍तूबर, २०१७ १२:२० अपराह्न

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केरल के मंदिरों में अब दलित पुजारी

भारत के दक्षिणी राज्य केरल में सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए छह दलितों को आधिकारिक तौर पर त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड का पुजारी नियुक्त किया गया है.

वैसे तो मंदिरों में ब्राह्मणों को ही पुजारी बनाने की परंपरा रही है, बावजूद इसके मंदिर ने पहले भी गैर ब्राह्मणों को पुजारी बनाया, लेकिन यह पहला मौका है जब दलित समुदाय के लोगों को पुजारी बनाया गया है.

देवस्वम बोर्ड ने केरल में संचालित अपने 1,504 मंदिरों के लिए पुजारियों की नियुक्ति में सरकार की आरक्षण नीति का पालन करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है.

बोर्ड ने इसके लिए लिखित परीक्षा और साक्षात्कार जैसे नियमों का पालन किया. जिसके नतीजे में पिछड़े समुदाय से 36 उम्मीदवार मेरिट लिस्ट में आ गए. इनमें छह दलित भी शामिल थे.

बोर्ड का यह निर्णय वाम मोर्चा की सरकार के देवस्वम बोर्ड के मंत्री कदमपल्ली सुरेंद्रन के निर्देश पर आधारित है.

हालांकि इस बात की भी आशंका है कि मंदिर में दलित पुजारियों की नियुक्ति का कुछ विरोध होगा. लेकिन, इस पहल के प्रस्तावकों को यह भी विश्वास है कि भक्तों के बीच दलित पुजारी की स्वीकृति को लेकर सर्वसम्मति भी बना ली जाएगी.

त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड के अध्यक्ष प्रयार गोपालकृष्णन ने बीबीसी से कहा, "आज कल, हिंदू धर्म में पूजा को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है, चाहे पुजारी ब्राह्मण हो या नायर. पूजा मुख्य उद्देश्य है."

गोपालकृष्णन ने कहा, "हम विभिन्न जातियों के बीच समन्वय बना कर खुश हैं ताकि हमारी नीति को लागू किया जा सके."

गोपालकृष्णन मानते हैं कि दलितों को पुजारी के रूप में नियुक्त करने का 'निश्चित रूप से विरोध' होगा. लेकिन, उन्होंने यह भी कहा कि पारंपरिक और आधुनिक व्यवस्था का मेल करने के लिए श्रद्धालुओं को समझाएंगे कि 'जातियों के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता है."

उन्होंने कहा, "वेदव्यास मछुआरे के बेटे थे. वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति से थे. जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने भी बताया था कि कुछ मौकों पर हिंदू धर्म इतना जातिवादी हो गया कि जिसमें पुरोहितों के रूप में केवल ब्राह्मणों की नियुक्ति की गई. हां, इस निर्णय के ख़िलाफ़ कुछ आवाज़ें भी उठेंगी, लेकिन यह स्वागतयोग्य कदम है."

कर्नाटक की तरह केरल में भी दलितों के मंदिर में प्रवेश की अनुमति राजसी आदेश के तहत दी गई. 1936 में वायकोम आंदोलन के बाद महाराजा ऑफ़ त्रावणकोर ने ऐसा किया. 1927 में महात्मा गांधी की आवाज़ पर मैसूर के राजा नलवाडी कृष्णराजा वडियर ने यह घोषणा की.

बैंगलुरू स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज में सोशल साइंस के प्रोफ़ेसर डॉक्टर नरेंद्र पाणि कहते हैं, "भारत के अन्य राज्यों की तुलना में कर्नाटक और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों में जाति व्यवस्था के ख़िलाफ आंदोलन की विविधता अलग रही."

उन्होंने कहा, "केरल में यह आंदोलन बेहद आक्रामक था जिसे महाराजा ऑफ़ त्रावणकोर का समर्थन प्राप्त था. फ़िर, पुराने मैसूर में नलवाड़ी कृष्णराजा वडियर जैसे राजा थे जिन्होंने आरक्षण नीति का फ़ैसला किया."

डॉक्टर पाणि एक अन्य वजह बताते हैं जिससे लोगों के पूजा करने के तरीके में फ़र्क पड़ेगा.

वो कहते हैं, "पहले से ही लोगों के पूजा करने के तरीके के चिह्न मौजूद हैं. लोग पूजा के लिए अलग अलग मंदिरों में जाते हैं. प्रत्येक समुदाय के पास पूजा करने के लिए अपने अपने भगवान हैं."

एक तरह से डॉक्टर पाणि यह कहते हैं कि केरल में भक्तों के बीच आम सहमति बनाने की वजहों में से एक यह हो सकता है.

कर्नाटक के मंगलुरू में कदरोली मंदिर में न केवल दलित पुजारी हैं बल्कि वहां विधवाएं भी हैं.

द हिंदू के तिरुवनंतपुरम के सीनियर एसोसिएट एडिटर सी. जी. गौरीदासन कहते हैं, "सामाजिक रूप से इससे विवाद होना तय है. राजनीतिक रूप से भी, क्योंकि तथ्य यह है कि बीजेपी निम्न और मध्यम समुदायों के बीच अपनी पहचान बनाने की कोशिश में लगी है."

नायर ने कहा, "केरल में सीपीएम के नेतृत्व वाली सरकार के इस कदम को बीजेपी-आरएसएस इस्तेमाल करने की पूरी कोशिश करेंगे क्योंकि वो वहां हिंदुओं को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं. निश्चित रूप से, सीपीएम पिछड़े समुदाय के बीच इस पर समर्थन जुटाने की कोशिश करेगी."

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स्रोत: bbc.com

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