जनतंत्र में पुलिस की भूमिका

१२ मई, २०१५ ३:५१ पूर्वाह्न

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विडंबना यह कि हत्या के तीन दिन में ही दोषी गैंग की पहचान हो जाने के बावजूद उन्हें दो हफ्ते तक गिरफ्तार न करने वाले गोरे अफसर का पब्लिक इन्क्वायरी के समक्ष तर्क रहा कि वह इस बुनियादी आपराधिक कानूनी प्रावधान से ही अनभिज्ञ था कि पुख्ता शक की बिना पर पुलिस को संदिग्ध की गिरफ्तारी का भी अधिकार है। उसके इस अविश्वसनीय दावे की तुलना भारत में आंध्र प्रदेश डीजीपी के हालिया प्रतिप्रश्न से की जा सकती है कि मीडिया उन्हें वह कानून दिखाए जिसके अनुसार स्वचालित बंदूकों से लैस उनकी पुलिस को कुल्हाड़ी/गंड़ासे वाले लकड़हारों के पैर पर गोली चलानी चाहिए थी, न कि उनके सिर पर या कमर से ऊपर। यानी यहां भी आत्मरक्षा के कानूनी प्रावधान- जो पुलिस को मुठभेड़ में सशर्त मार गिराने की इजाजत देते हैं- में अंतर्निहित सर्वाधिक बुनियादी कानूनी विवेक को ही भुला दिया गया- बल प्रयोग उतना, आवश्यक हो जितना!

अब हैदराबाद उच्च न्यायालय के दखल पर आंध्र प्रदेश पुलिस को अज्ञात पुलिसवालों के विरुद्ध हत्या का मुकदमा भी दर्ज करना पड़ा है। यहां पूर्वग्रह की कोख से ही उपजा एक और सवाल बनेगा कि अज्ञात के विरुद्ध क्यों, जब एसटीएफ ऑपरेशन में हिस्सा लेने वाला दस्ता ज्ञात है?

स्रोत: jansatta.com

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