जवाबदेही से दूर राजनीति

९ अगस्त, २०१५ १०:४१ पूर्वाह्न

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दूसरी दिलचस्प विसंगति राज्यसभा में देखने को मिली, जहां सदन के नेता अरुण जेटली अपने उस बयान का औचित्य सिद्ध कर रहे थे, जिसमें उन्होंने व्यंग्यपूर्वक कहा था कि यह एक गंभीर सवाल है कि एक परोक्ष रूप से चुना हुआ सदन बार-बार सीधे जनता द्वारा चुने गए सदन की बुद्धिमत्ता और विवेक पर सवालिया निशान लगाए जा रहा है। यह टिप्पणी उन्हीं अरुण जेटली की है, जो वित्त मंत्रालय और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय जैसे दो महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभालने वाले केंद्र सरकार के सबसे शक्तिशाली मंत्री सिर्फ इसीलिए हैं, क्योंकि वे इस परोक्ष रूप से चुने गए सदन के सदस्य हैं। वरना जनता ने तो लोकसभा चुनाव में उन्हें नकार दिया था। क्या ऐसे वक्त के लिए ही ‘जिस थाली में खाएं, उसी में छेद करें’ वाला मुहावरा बना था!

अटल बिहारी वाजपेयी एक संस्मरण सुनाया करते थे कि जब उन्होंने लोकसभा में पहला भाषण दिया, तो उसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कड़ी आलोचना की। शाम को किसी दूतावास की पार्टी में नेहरू उन्हें देख कर उनके पास आए और उनकी पीठ थपथपा कर बोले: ‘आज तुम बहुत अच्छा बोले। लेकिन कुछ ज्यादा सख्त नहीं हो गया क्या?’ और यह कह कर एक बार फिर पीठ थपथपा कर मुस्कराते हुए किसी दूसरे व्यक्ति की ओर मुखातिब हो गए। आज क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि अपनी कड़ी आलोचना सुनने के बाद प्रधानमंत्री तो क्या, कोई मंत्री भी किसी नौसिखिए सांसद का इस तरह हौसला बढ़ाएगा?

उधर कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष वही गलती कर रहा है, जो भाजपा ने की थी। वह संसद की कार्यवाही ठप्प किए हुए है और भाजपा को उसके आचरण की याद दिला रहा है। कुछ दिन तक इसे जायज भी माना जा सकता था, लेकिन इसे प्रतीकात्मक ही रखना उचित होता। संसद का पूरा वर्षा सत्र बेकार होने जा रहा है। विपक्ष को समझना चाहिए कि संसद सरकार की जवाबदेही का मंच है। इसे नाकारा बनाने का अर्थ लोकतंत्र को कमजोर करना होगा। सत्तापक्ष यही चाहता भी है, और विपक्ष इसमें उसकी मदद कर रहा है। लेकिन क्या यह देश के हित में है?

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स्रोत: jansatta.com

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