जूनागढ़: वास्तुकला की जीवंत मिसाल

२२ मई, २०१५ ८:४५ पूर्वाह्न

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जूनागढ़: वास्तुकला की जीवंत मिसाल

जूनागढ़ शहर के निकट स्थित कई मंदिर और मस्जिदें इसके लंबे और जटिल इतिहास को उद्घाटित करते हैं. जूनागढ़ इतिहास व वास्तुकला की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण शहर है, अपनी हरियाली और नवाबों के समकालीन किलों और महलों के कारण पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है,गिरनार पर्वत पर स्थित जैन, हिंदू, मुस्लिम अनुयायियों को भी बरबस junagarhअपनी ओर खिंचता है.जूनागढ़ गुजरात के सौराष्ट्र इलाके का हिस्सा है.जूनागढ़ गिरनार पहाड़ियों के निचले हिस्से पर स्थित है. इस शहर का निर्माण नौवीं शताब्दी में हुआ था, गिरनार के रास्ते में एक गहरे रंग की बेसाल्ट चट्टान है जिस पर तीन राजवंशों का प्रतिनिधित्व करने वाला शिलालेख अंकित है.

गिरनार जाने के रास्ते पर सम्राट अशोक द्वारा लगवाए गए शिलालेखों को देखा जा सकता है. ये शिलालेख विशाल पत्थरों पर उत्कीर्ण हैं. अशोक ने चौदह शिलालेख लगवाए थे. इन शिलालेखों में राजकीय आदेश खुदे हुए हैं. इसके अतिरिक्त इसमें नैतिक नियम भी लिखे हुए हैं. ये आदेशपत्र राजा के परोपकारी व्यवहार और कार्यो का प्रमाणपत्र है. अशोक के शिलालेखों पर ही शक राजा रुद्रदाम तथा [स्कंदगुप्त] के खुदवाए अभिलेखों को देखा जा सकता है. रुद्रदाम ने 150 ई. में तथा स्कंदगुप्त ने 450 ई. में ये अभिलेख खुदवाये थे. इस अभिलेख की एक विशेषता यह भी है कि रुद्रदाम के अभिलेख को ही संस्कृत भाषा का प्रथम शिलालेख माना जाता है.

माना जाता है कि इस किले का निर्माण यादवों ने द्वारिका आने पर करवाया था (जो कृष्ण भगवान से संबंधित थे). अपरकोट की दीवारें किसी-किसी स्थान पर 20 मीटर तक ऊंची है. किले पर की गई नक्काशी अभी भी सुरक्षित अवस्था में है. इस किले में पश्चिमी दीवार पर दो तोपे लगी हैं. इन तोपों का नाम नीलम और कांडल है. इन तोपों का निर्माण मिस्त्र में हुआ था. इस किले के चारों ओर 200 ईस्वी पूर्व से 200 ईस्वी तक की बौद्ध गुफाएं है.

जूनागढ़ का यह प्राणीउद्यान गुजरात का सबसे पुराना प्राणीउद्यान है. यह प्राणीउद्यान गिर के विख्यात शेर के अलावा चीते और तेंदुआ के लिए प्रसिद्ध है. गिर के शेरों को लुप्तप्राय होने से बचाने के लिए जूनागढ़ के नवाब ने 1863 ईस्वी में इस प्राणीउद्यान का निर्माण करवाया था. यहां शेर के अलावा बाघ, तेंदुआ, भालू, गीदड़, जंगली गधे, सांप और चिड़िया भी देखने को मिलती है. यह प्राणीउद्यान लगभग 500 एकड़ में फैला हुआ है.

वन्य प्राणियों से समृद्ध गिर राष्ट्रीय उद्यान गिरनार जंगल के करीब है. यह राष्ट्रीय उद्यान आरक्षित वन है और एशियाई शेरों के लिए एकमात्र घर है. इस वन्य अभ्यारण्य में अधिसंख्य मात्रा में पुष्प और जीव-जन्तुओं की प्रजातियां मिलती है. यहां स्तनधारियों की 30 प्रजातियां, सरीसृप वर्ग की 20 प्रजातियां और कीड़ों-मकोड़ों तथा पक्षियों की भी बहुत सी प्रजातियां पाई जाती है. यहां हिरण, सांभर, चीतल, नीलगाय, चिंकारा, बारहसिंगा, भालू और लंगूर भी देखा जा सकता है.

बौद्ध गुफा चट्टानों को काट कर बनायी गई है. इस गुफा में सुसज्जित खंभे, गुफा का अलंकृत प्रवेशद्वार, पानी के संग्रह के लिए बनाए गए जल कुंड, चैत्य हॉल, वैरागियों का प्रार्थना कक्ष, चैत्य खिड़कियां स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण पेश करती हैं. शहर में स्थित खापरा-कोडिया की गुफाएं भी देखने लायक है.

नवघन कुआं और अड़ी-काड़ी वेव का निर्माण चूडासमा राजपूतों ने कराया था. इन कुओं की संरचना आम कुओं से बिल्कुल अलग तरह की है. पानी के संग्रह के लिए इसकी अलग तरह की संरचना की गई थी. ये दोनों कुएं युद्ध के समय दो सालों तक पानी की कमी को पूरा कर सकते थे. अड़ी-कड़ी तक पहुंचने के लिए 120 पायदान नीचे उतरना होता है, जबकि नवघन कुंआ 52 मीटर की गहराई में है.

जामा मस्जिद मूलत: रानकीदेवी का निवास स्थान था. मोहम्मद बेगड़ा ने जूनागढ़ फतह के दौरान (1470 ईस्वी) अपनी विजय की याद में इसे मस्जिद में तब्दील कर दिया था . यहां अन्य आकर्षणों में नीलम तोप है जिसे तुर्की के राजा सुलेमान के आदेश पर पुर्तगालियों से लड़ने के लिए बनवाया गया था. यह तोप मिस्त्र से दीव के रास्ते आई थी.

यहां पर हर साल दो त्योहार मनाए जाते हैं. अक्टूबर-नवंबर के महीने में पांच दिनों की अवधि के दौरान पांचवे दिन यानी पूर्णिमा के दिन कार्तिक महीने के समापन पर इस मंदिर की परिक्रमा करने के बाद झंडा लगाने के बाद आयोजित किया जाता है. गिरनार पर्वत के चारों ओर लगभग 40 किमी की परिक्रमा या परिपत्र यात्रा पांच दिनों तक चलती है. फरवरी-मार्च के दौरान माघ महीने के अमावस्या के दिन इस मंदिर में महाशिवरात्री का त्योहार मनाया जाता है.

इस पवित्र कुंड के चारों ओर घाट (नहाने के लिए) का निर्माण किया गया है. ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस घाट पर भगवान श्री कृष्ण ने महान संत कवि नरसिंह मेहता को फूलों का हार पहनाया था.

स्रोत: palpalindia.com

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