पुलिस, मंत्री और असल-नकल का 'कानून'

१० जून, २०१५ ६:४९ अपराह्न

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पुलिस, मंत्री और असल-नकल का 'कानून'

चार दिन यानी 96 घंटों की रिमांड. इन घंटों में पुलिस को न सिर्फ तोमर पर लगे तमाम इल्जामों की तस्दीक करनी है बल्कि वो सुबूत भी जुटाने हैं, जो अदालत में टिक सकें. यह और बात है कि इस सफर के पहले पड़ाव में ही उसे बड़ी कामयाबी मिली है.

वैसे तो दिल्ली बार काउंसिल और दिल्ली पुलिस पहले दिन से ही तोमर के दावों को गलत बता रही थी, लेकिन दिल्ली से तोमर को लेकर बुधवार को फैजाबाद पहुंची पुलिस टीम ने जब राम मनोहर लोहिया अवध यूनिवर्सिटी में अपने कदम रखे तो तोमर के दावों की असलियत जैसे सही मायने में खुलकर सामने आ गई.

पुलिस ने जब यूनिवर्सिटी के अधिकारियों से ग्रेजुएशन की डिग्री को लेकर तोमर का आमना-सामना करवाया तो आखि‍रकार वही बात निकल कर सामने आ गई जिसका डर था. यूनिवर्सिटी के मीडिया इंचार्ज ने दो टूक शब्दों में साफ कर दिया कि तोमर के पास मौजूद उनके यूनिवर्सिटी की बीएससी की डिग्री असल नहीं बल्कि फर्जी है.

अब तक की तफ्तीश से इस बात के संकेत मिलने लगे हैं कि इन सबके पीछे किसी ऑर्गेनाइज्ड गैंग का ही हाथ है. लेकिन पुलिस के सामने सबसे अहम सवाल ये है कि क्या तोमर ने सिर्फ एक क्लाइंट के तौर पर फर्जी डिग्री और सर्टिफिकेट्स हासिल किए या फिर इस रैकेट से सीधे तौर पर भी उनका कोई लेना-देना था? सीधे-सीधे कहें तो कहीं तोमर खुद ही फर्जी डिग्री का रैकेट तो नहीं चला रहे थे.

चार दिन, 3 राज्य और 3 हजार किलोमीटर का सफर. दिल्ली के कानून मंत्री रहे जितेंद्र सिंह तोमर को लेकर सुबूत जुटाने निकली पुलिस के लिए ये सफर बेहद लंबा है. लेकिन पुलिस के पास सिर्फ 96 घंटों का समय है. ऐसे में अब पुलिस अपने तमाम सवालों के जवाब ना सिर्फ हाथों-हाथ हासिल करना चाहती है बल्कि तोमर की आंखों के सामने ही उन्हें वैरीफाई भी कर लेना चाहती है.

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स्रोत: aajtak.intoday.in

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