फ़िल्म रिव्यू: फुस्स बम है 'बंगिस्तान'

७ अगस्त, २०१५ ३:३० अपराह्न

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फ़िल्म रिव्यू: फुस्स बम है 'बंगिस्तान'

बंगिस्तान के इंटरवल के वक़्त आप चाहें तो दबे पांव सिनेमाहॉल से बाहर निकल सकते हैं. हो सकता है ऐसा करते हुए दूसरे दर्शक भी आपको मिल जाएं.

फ़िल्म के एक अहम मोड़ में एक ग्लोबल कॉन्फ़्रेंस में दो आत्मघाती हमलावर वहां जमा हुए सच्चे, ईमानदार धार्मिक नेताओं को उड़ाने आते हैं. यही से दर्शकों के मन में डर पैदा हो जाएगा कि इस मोड़ से फ़िल्म सीरियस हो जाएगी. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इससे पहले की फ़िल्म कुछ मज़ेदार थी.

ये दो आत्मघाती हमलावर बंगिस्तान नाम के एक काल्पनिक देश से आए हैं. इन दो मूर्खों को धार्मिक कट्टरपंथियों ने धर्म के नाम पर बरगलाया है.

मुख्य भूमिका निभाई है रितेश देशमुख ने जो पूरी फ़िल्म में खोए-खोए से लगते हैं और दूसरे हीरो हैं पुल्कित सम्राट, जो सलमान ख़ान के हमशक्ल से लगते हैं. दोनों ने पूरी फ़िल्म में इतना अस्वाभाविक अभिनय किया है कि मानव बम तो छोड़िए ये मानव तक नहीं लगते.

ये फ़िल्म बड़ी अस्त-व्यस्त सी लगती है. जब ये फ़िल्म गंभीर होने की कोशिश करती है तो बड़ी आडंबरपूर्ण और नकली लगने लगती है, हालाँकि इसमें कुछ जायज़ बातें कहने की कोशिश की गई है.

तो क्या इस फ़िल्म को सिर्फ़ इस वजह से सराहना चाहिए कि ये धार्मिक कट्टरता को चुनौती देती है. या ये एक बहादुर फ़िल्म है. मैं निश्चित तौर पर कुछ नहीं कह सकता. ये फ़िल्म निर्देशक करन अंशुमन की पहली फ़िल्म है.

वो फ़िल्म समीक्षक रह चुके हैं. जब भी कोई क्रिटिक, फ़िल्मकार बनता है तो उसे कई तरह के मज़ाक सहने ही पड़ते हैं.

तो क्या एक अच्छा फ़िल्म समीक्षक, अच्छा निर्देशक भी साबित हो सकता है. हमारे पास फ्रांसवा ट्रूफ़ो, मृणाल सेन, कुणाल कोहली से लेकर साजिद ख़ान जैसे तमाम उदाहरण हैं जिनके करियर पर नज़र डालकर आप किसी नतीजे पर पहुँच सकते हैं.

लेकिन मेरे हिसाब से दोनों ही बातें बिलकुल जुदा हैं. ये तो वही बात हो गई कि जो बंदा पोर्न बहुत देखता है वो सेक्स कला में भी बड़ा निपुण होगा.

मेरे हिसाब से फ़िल्म बनाना, उसकी समीक्षा करने से कहीं ज़्यादा मुश्किल है. हां, दर्शकों को आपकी फ़िल्म पसंद ना आए वो अलग बात है.

स्रोत: bbc.com

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