महंगा नहीं होगा इंटरनेट, ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ पर अगले महीने फैसला लेगी सरकार

२२ मई, २०१५ ८:४५ पूर्वाह्न

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महंगा नहीं होगा इंटरनेट, ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ पर अगले महीने फैसला लेगी सरकार

नई दिल्ली. पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर बहस का विषय बने ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ पर अंतिम फैसला अगले महीने आ सकता है. एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में टेलिकॉम मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद ने ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ या इंटरनेट तटस्थता का समर्थन करने के संकेत दिए हैं. हालांकि, सरकार के फैसले का खुलासा अगले महीने ही हो पाएगा, जब विशेषज्ञ समिति अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी.

प्रसाद ने कहा, "इंटरनेट इंसान के दिमाग से उपजी सबसे शानदार चीजों में से एक है और इसके प्रसार के लिए जरूरी है कि इसे लोकल किया जाए. इंटरनेट की फील्ड में यंग जेनरेशन का योगदान सराहनीय है और इस मामले में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए." पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान सोशल मीडिया के जरिए काफी संख्या में यंग वोटर्स को अपने पक्ष में करने वाली बीजेपी उन्हें ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ के मुद्दे पर नाराज नहीं करना चाहती और इसीलिए माना जा रहा है कि सरकार इसका समर्थन करेगी. दूसरे शब्दों में कहें तो वह टेलिकॉम कंपनियों की मांगों के आगे घुटने नहीं टेकेगी.

‘नेट न्यूट्रैलिटी’ जारी रखने के लिए इंटरनेट पर करीब 2 लाख लोग कैम्पेन चला रहे हैं. इन लोगों में आम लोगों से लेकर फिल्म स्टार्स और नेता भी शामिल हैं. इन सभी लोगों ने ट्राइ से मांग की है कि ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ को जारी रखा जाए. हालांकि, प्रसाद ने साफ तौर पर सरकार का पक्ष बताने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि इस बारे में पहले ही कमेटी का गठन किया जा चुका है जो अपनी सिफारिशें मई महीने के दूसरे हफ्ते तक दे देगी. ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ में सभी प्रकार के इंटरनेट ट्रैफिक के साथ समान बर्ताव किया जाता है. किसी व्यक्ति या कंपनी को सिर्फ भुगतान के आधार पर प्राथमिकता नहीं दी जाती. इस तरह के किसी कदम को पक्षपातपूर्ण माना जाता है. कुछ ऑपरेटरों द्वारा स्काइप और वाइबर जैसी वॉइस कॉल सेवाओं के लिए अतिरिक्त शुल्क वसूलने की कोशिश के बाद यह मुद्दा उठाया गया था. अमेरिका, चिली, नीदरलैंड और ब्राजील जैसे देश पहले ही ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ अपना चुके हैं. जबकि ट्राई का कहना है कि ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ पर भारत में कोई कानून नहीं है, इसलिए फिलहाल कंपनियों पर वह कार्रवाई नहीं कर सकती.

जब कोई भी व्यक्ति किसी ऑपरेटर से डाटा पैक लेता है तो उसका अधिकार होता है कि वो नेट सर्फ करे या फिर स्काइप, वाइबर पर वॉइस या वीडियो कॉल करे, जिस पर एक ही दर से शुल्क लगता है. ये शुल्क इस बात पर निर्भर करता है कि उस व्यक्ति ने उस दौरान कितना डाटा इस्तेमाल किया है. यही नेट न्यूट्रैलिटी कहलाती है. सरल भाषा में कहें तो आप बिजली का बिल देते हैं और बिजली इस्तेमाल करते हैं. ये बिजली आप कम्प्यूटर चलाने में खर्च कर रहे हैं, फ्रिज चलाने में या टीवी चलाने में, इससे बिजली कंपनी का कोई लेना-देना नहीं होता. कंपनी ये नहीं कह सकती कि अगर आप टीवी चलाएंगे तो बिजली के रेट अलग होंगे और फ्रिज चलाएंगे तो अलग. लेकिन अगर नेट न्यूट्रैलिटी खत्म हुई तो इंटरनेट डाटा के मामले में आपको हर सुविधा के लिए अलग से भुगतान करना पड़ सकता है. इससे कंपनियों को तो फायदा होगा, लेकिन आम जनता के लिए इंटरनेट काफी महंगा हो जाएगा.

टेलिकॉम कंपनियां इस बात से परेशान हैं कि नई तकनीक ने उनके कारोबार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं, जैसे वॉट्सऐप के मुफ्त ऐप ने एसएमएस सेवा को लगभग खत्म ही कर डाला है, इसलिए कंपनियां ऐसी सेवाओं के लिए ज्यादा रेट वसूलने की कोशिश में हैं, जो उनके कारोबार और राजस्व को नुकसान पहुंचा रही हैं. हालांकि, इंटरनेट सर्फिंग जैसी सेवाएं कम रेट पर ही दी जा रही हैं.

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स्रोत: palpalindia.com

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