रामायण पर क्यों नहीं लिख सकता मुसलमान

४ सितंबर, २०१५ १२:११ अपराह्न

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रामायण पर क्यों नहीं लिख सकता मुसलमान

इस साल दो जून को मैं जकार्ता के राष्ट्रीय म्यूज़ियम चौराहे पर खड़ा था, जो पुराने शहर के बटाविया इलाक़े में है.

यह राष्ट्रीय छुट्टी का दिन था और वहां कुछ इसी तरह का नज़ारा था जैसा दिल्ली में इंडिया गेट पर होता है.

मुझे ये जानकर आश्चर्य हुआ कि दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में बुद्ध पूर्णिमा के मौक़े पर राष्ट्रीय छुट्टी होती है. इसे यहां हरि राया वैसाख कहते हैं.

वहां पारंपरिक वेश भूषा पहने कुछ लोग मौजूद थे, मगर वहीं एक ऐसा शख्स एक पटरी पर खड़ा था जिसके नीचे 'अनोमान' की पट्टी लगी थी. मेरे साथ मौजूद मेरे दोस्त ने बताया कि इसका अर्थ हनुमान है.

अगर मुझे ये बात न बताई गई होती तो मुझे पता नहीं चलती कि वो व्यक्ति हनुमान का किरदार निभा रहा है, क्योंकि वो उस तरह की वेश-भूषा में नहीं था, जिस तरह से हम हनुमान को भारत में दर्शाते हैं.

दक्षिण-पूर्व एशिया, ख़ासतौर पर इंडोनेशिया में रामायण और महाभारत इतने लोकप्रिय इसलिए हैं कि वे कहानियां हैं.

भारत में कुछ लोगों के लिए वह धर्म हो सकता है, पर ये मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है. मानव समाज की कहानियों में दिलचस्पी ज़्यादातर धर्मों के फलने फूलने की एक बड़ी वजह रही है.

रामायण और महाभारत की दक्षिण एशिया में लोकप्रियता को देखकर भारत के हिंदुओं को गौरव महसूस होता है. कुछ साल पहले लालकृष्ण आडवाणी बाली गए थे और उन्होंने वहां हिंदू विरासत को बरक़रार रखने के लिए इंडोनेशिया की तारीफ़ की थी.

केरल की हनुमान सेना को पुराने बटाविया के 'अनोमान' से आपत्ति हो सकती है. एक मुसलमान भला हनुमान की रूप रेखा किस तरह धारण कर सकता है? मुसलमानोें को हिंदू महाकाव्यों से जुड़ने की इजाज़त कैसे दी जा सकती है?

केरल सेना देश भर में फैले अनगिनत हिंदू संगठनों में एक है, जो नए उग्रपंथी और राजनीतिक हिंदुत्व में यक़ीन करते हैं. ये संगठन कट्टर इस्लाम में विश्वास रखने वालोें और धर्म परिवर्तन कराने में लगे ईसाइयों की नक़ल करते हैं. वो उनसे ईशनिंदा, हिंसा, दूसरे को वंचित रखने की सोच को उन संगठनों से अपनाना चाहते हैं.

हनुमान सेना ने केरल के मशहूर विद्वान एमएम बशीर को मलयालम अख़बार 'मातृभूमि' में रामायण पर कॉलम लिखने से रोका है. बशीर रामायण पर आधारित छह कॉलम लिखना चाहते थे.

उन्हें और उस अख़बार को फ़ोन पर इतनी सारी गालियां दी गईं कि पांच कॉलम के बाद उन्होंने पांचवा स्तंभ नहीं लिखा. अख़बार के दफ़्तर के बाहर पोस्टर भी लगाए गए.

इंडोनेशिया में मुझे इस पर ताज्जुब हुआ कि दुनिया की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश अपने हिंदू और बौद्ध अतीत के साथ किस तरह सहज है. लगता है, इंडोनेशिया यह समझता है कि किसी शख़्स की धार्मिक प्रतिबद्धता उसकी कई पहचानोें में बस एक पहचान है.

इंडोनेशिया में भी कट्टर इस्लाम में यक़ीन रखनेवालों की एक जमात है. पर वह दूसरी जगहों में फैल रहे इस्लामी कट्टरपंथ की तुलना में उतने मुखर नहीं हैं. वो भारत के हिंदू अतिवादियों की तुलना में भी कम उग्र हैं जिन्होंने इस बात का ठेका ले लिया है कि रामायण के बारे में कौन लिख सकता है.

एमएम बशीर ने इंडिन एक्सप्रेस अख़बार से कहा, "75 वर्ष की उम्र में मुझे एक मुसलमान होने तक सीमित कर दिया गया है."

वे आगे कहते हैं, "फ़ोन करने वाले मुझसे पूछ रहे थे कि मुझे भगवान राम की आलोचना करने का क्या हक़ है? मेरे कॉलम वाल्मीकि रामायण के बारे में थे. वाल्मीकि ने राम के किरदार को मानवीय चरित्र के रूप में पेश किया है और उनकी आलोचना से संकोच नहीं किया है. लोग उन हिस्सों पर एतराज़ जता रहे थे जिनमें राम की आलोचना करने वाले वाल्मीकि रामायण के दोहों की हूबहू कापी की गई थी. ज़्यादातर फ़ोन करनेवाले मेरी बात सुनने को तैयार नहीं थे लेकिन मुझे गालियां दे रहे थे."

बशीर इसके आगे कहते हैं, "उनमें से जिन चंद लोगों ने थोड़े धैर्य का परिचय दिया उनसे मैंने कहा कि मैंने पिछले साल आध्यात्म रामायण पर लिखा था. यह मलयालम के लोकप्रिय तुनचतु इझूतछन का मूल आधार है. मैंने उन कुछ लोगों से भगवान राम के बारे में बात की. लेकिन फ़ोन करनेवाले में से कुछ ही को दोनों रामायणों के अंतर के बारे में मालूम था, और उनमें से कुछ ही को शायद इसकी परवाह भी थी. ज्यादातर लोग इस पर ज़ोर देेते रहे कि मैंने राम की आलोचना सिर्फ़ इसलिए की क्योंकि मैं एक मुसलमान हूं."

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हनुमान सेना के लोगों ने वाल्मीकि रामायण नहीं पढ़ी है. अगर हिंदुत्व के ठेकेदारों ने वाक़ई हिंदू महाकाव्यों का अध्ययन किया होता वे इस तरह की बहसों पर ऐसा रवैया नहीं अपनाते.

उन्हें तो आम जनता को रामायण के बारे में बताने के लिए एमएम बशीर का शुक्रग़ुजार होना चाहिए. अगर वे सचमुच हिंदू होने पर गौरव करते हैं तो उन्हें खुश होना चाहिए कि मुसलमान नाम वाला एक आदमी रामायण से जुड़ा है. पर ऐसे लोग चाहते हैं कि बशीर सिर्फ़ मुस्लिम इतिहास और उससे जुड़ी चीज़ों को देखें.

हिंदू, मुसलमानों और ईसाइयों के बीच इस तरह की विभाजन रेखा हिंदू विचारधारा की मूल अवधारणा के ख़िलाफ़ है. हिंदू धर्म सबको साथ लेकर चलने में यक़ीन रखता है.

कट्टर हिंदुत्ववादी दरअसल हिंदू समाज को उसी तरह बनाना चाहते हैं जिस तरह इस्लामी कट्टरपंथी मुसलमान समाज को बदलने की कोशिश कर रहे हैं.

केरल की हनुमान सेना के लोगों को जर्काता के एक दौरे से बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है.

स्रोत: bbc.com

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